जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के पृथ्वी पर अवतरण का महापर्व है। यह अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है, जब रोहिणी नक्षत्र में आधी रात के समय भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था।
आधी रात को भव्य जन्मोत्सव मनाया जाता है — मंदिरों में शंख-घंटियाँ बजती हैं, झांकियाँ सजाई जाती हैं और भक्त भजन-कीर्तन में लीन हो जाते हैं। अगले दिन दही-हांडी का भव्य आयोजन होता है जिसमें युवा गोविंदा बनकर ऊँचाई पर बंधी मटकी फोड़ते हैं। मथुरा-वृंदावन से लेकर देशभर में रासलीला, झूले और रंग-बिरंगे आयोजन होते हैं।
द्वापर युग के अंत में पृथ्वी पर अधर्म का बोलबाला था। मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने अपनी ही बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया था, क्योंकि आकाशवाणी में कहा गया था कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। कंस ने एक-एक करके देवकी के सात पुत्रों का वध कर दिया। अंततः आठवें पुत्र के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया, जो आगे चलकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बने और गीता का अमर ज्ञान दिया।
जब भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि आई, रोहिणी नक्षत्र में चारों ओर घोर अंधकार छाया था और मूसलाधार वर्षा हो रही थी। उसी क्षण मथुरा के कारागार में देवकी की कोख से चतुर्भुज विष्णु रूप में भगवान प्रकट हुए। माता देवकी और पिता वासुदेव ने भगवान से प्रार्थना की कि वे साधारण बालक का रूप धारण करें।
भगवान की लीला से कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए, सारे ताले स्वतः खुल गए और लोहे की बेड़ियाँ टूट गईं। वासुदेव जी ने बाल कृष्ण को सूप में रखकर अपने सिर पर उठाया और मूसलाधार वर्षा के बीच यमुना नदी पार करने के लिए निकल पड़े।
यमुना नदी अपने उफान पर थी, परंतु जैसे ही श्री कृष्ण के चरण उसके जल को छूते, यमुना शांत होकर मार्ग दे देती। शेषनाग ने अपने फण से बाल कृष्ण पर वर्षा से रक्षा की। वासुदेव जी ने गोकुल पहुँचकर नंदबाबा के घर में बाल कृष्ण को यशोदा माता के पास रखा और वहाँ से उनकी नवजात कन्या को लेकर पुनः कारागार लौट आए। यही माया-योगिनी कन्या आगे चलकर कंस को आकाशवाणी देती है कि उसका वध करने वाला बच चुका है। इस प्रकार पृथ्वी पर भगवान श्री कृष्ण का आगमन हुआ — अधर्म के अंत और धर्म की स्थापना के लिए।
गोकुल पहुँचकर बाल कृष्ण ने यशोदा माता और नंदबाबा के घर अपनी अद्भुत लीलाएँ कीं — माखन चोरी, गोपियों संग रास, पूतना वध, कालिया नाग दमन, गोवर्धन पर्वत धारण। अंततः मामा कंस का वध करके मथुरा का राज्य प्रजा को सौंप दिया और महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बनकर गीता का अमर उपदेश दिया।
- व्रत — पूरे दिन निर्जला या फलाहारी व्रत
- झूला झुलाना — बाल कृष्ण की मूर्ति को सुंदर पालने में झुलाना
- दही-हांडी — मटकी फोड़ने का पारंपरिक खेल
- रासलीला — कृष्ण-गोपियों की लीला का मंचन
- भजन-कीर्तन — रात्रि जागरण के साथ भक्ति संगीत
- मध्यरात्रि पूजा — ठीक 12 बजे जन्मोत्सव
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें (पीले या नीले रंग शुभ)
- पूजा स्थान को साफ करके कृष्ण की मूर्ति स्थापित करें
- बाल कृष्ण को झूले में स्थापित करें
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें
- नए वस्त्र, मुकुट, माला और बांसुरी अर्पित करें
- छप्पन भोग या न्यूनतम 5 प्रकार के व्यंजन अर्पित करें
- तुलसी पत्र चढ़ाएँ (अत्यंत आवश्यक)
- मध्यरात्रि 12 बजे जन्मोत्सव मनाएँ — आरती और भजन
प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
छप्पन भोग का अर्थ है 56 प्रकार के विशेष व्यंजन जो भगवान कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि जब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को 7 दिन तक उठाए रखा, तब उन्होंने अन्न-जल नहीं ग्रहण किया था। उनके भक्तों ने उन्हें 8 पहर × 7 दिन = 56 भोग अर्पित कर उनकी सेवा की। तब से जन्माष्टमी और अन्न-कूट पर्व पर छप्पन भोग चढ़ाने की परंपरा है।
- मथुरा-वृंदावन — कृष्ण के जन्मस्थल पर भव्य उत्सव, झांकियाँ और रासलीला
- महाराष्ट्र — दही-हांडी का प्रसिद्ध आयोजन (गोविंदा गोविंदा)
- दक्षिण भारत — गोकुलाष्टमी, घर के बाहर बाल कृष्ण के पदचिह्न बनाना
- गुजरात — द्वारका में विशेष पूजा और भजन कार्यक्रम
- उड़ीसा — जगन्नाथ पुरी में विशेष अनुष्ठान
- मणिपुर — रास नृत्य की अनूठी परंपरा
क्या करें
- कृष्ण मंत्रों का जाप करें
- गाय की सेवा करें
- तुलसी पत्र अर्पित करें
- भगवद् गीता का पाठ करें
- रात्रि जागरण में भाग लें
क्या न करें
- चावल का सेवन न करें (यदि व्रत है)
- तुलसी के पत्ते न तोड़ें (पहले से तोड़ कर रखें)
- मांसाहार और तामसिक भोजन से बचें
- क्रोध और विवाद से बचें
- गाय या किसी प्राणी को कष्ट न दें