भगवान श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं और सनातन धर्म में सर्वोच्च पूज्य देवताओं में से एक हैं। उनका जन्म द्वापर युग में मथुरा में जेल के अंदर पिता वासुदेव और माता देवकी के यहाँ हुआ था। बाद में उनका पालन-पोषण गोकुल में नंद बाबा और यशोदा माँ के घर हुआ।
श्रीकृष्ण का जीवन लीलाओं का अनुपम संगम है — गोकुल की बाल लीलाएँ, वृन्दावन में राधा और गोपियों के साथ रास, मथुरा में कंस-वध, द्वारका में राज्य संचालन और कुरुक्षेत्र में श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश। वे अर्जुन के सारथी बनकर महाभारत के युद्ध में धर्म की स्थापना के लिए प्रकट हुए।
श्रीकृष्ण को "पूर्ण पुरुषोत्तम" कहा जाता है — जिसमें सभी 16 कलाएँ विद्यमान हैं। वे ज्ञान, भक्ति, कर्म और प्रेम — चारों मार्गों के आदर्श हैं। उनका मुरली स्वर, मोर पंख मुकुट और पीताम्बर वस्त्र — हर भक्त के हृदय में बस गए हैं।
मुख्य जानकारी
- अवतार: विष्णु के 8वें अवतार
- जन्म: मथुरा (कारागार)
- पिता: वासुदेव, माता: देवकी
- पालन: नंद बाबा, यशोदा माँ
- परम प्रिया: राधा रानी
- पत्नियाँ: रुक्मिणी, सत्यभामा (अष्ट पटरानी)
- राज्य: द्वारका
प्रमुख त्योहार
- जन्माष्टमी: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
- राधाष्टमी: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
- होली: फाल्गुन पूर्णिमा
- गोवर्धन पूजा: कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
- शरद पूर्णिमा: रास लीला उत्सव
- गीता जयंती: मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी
मंत्र
श्रीकृष्ण के मंत्रों का जप अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। ये मंत्र मन को शांति, हृदय को प्रेम और आत्मा को मोक्ष प्रदान करते हैं।
विशेष महत्व
श्रीकृष्ण का जीवन एक लीला-पुराण है, जिसमें हर पल भक्ति, ज्ञान और प्रेम का दिव्य संदेश है। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि भगवान भक्तों के लिए सर्वसुलभ हैं — चाहे वे ग्वाला हो, सुदामा जैसा गरीब मित्र, या अर्जुन जैसा महायोद्धा।
श्रीमद्भगवद्गीता — कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले अर्जुन के मोह को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया दिव्य उपदेश — आज भी मानवता का सर्वोच्च मार्गदर्शक ग्रंथ है। इसमें कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग — तीनों का अद्भुत समन्वय है।
कृष्ण-भक्ति का सबसे बड़ा रहस्य है — "समर्पण"। जो भक्त निःस्वार्थ भाव से कृष्ण की शरण में जाता है, उसे कृष्ण स्वयं अपना लेते हैं — यह उनका वचन है "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"।
श्रीकृष्ण की प्रमुख कथाएँ
श्रीकृष्ण की कथाएँ अनगिनत हैं — यहाँ कुछ प्रमुख लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन है —
प्रमुख त्योहार (विस्तृत)
श्रीकृष्ण से जुड़े त्योहार भारत और विश्व भर में बड़ी श्रद्धा और आनंद के साथ मनाए जाते हैं —
आइकनोग्राफी व गुण
श्रीकृष्ण की आइकनोग्राफी अत्यंत मनोहर और प्रतीकात्मक है। उनका हर लक्षण आध्यात्मिक संदेश देता है —
प्रमुख पावन स्थल
श्रीकृष्ण के मंदिर भारत भर में फैले हैं। यहाँ कुछ सबसे प्रसिद्ध और पावन स्थल दिए गए हैं, जहाँ प्रति वर्ष लाखों भक्त दर्शन हेतु पहुँचते हैं —
संबंधित ग्रन्थ
श्रीकृष्ण की महिमा और लीलाओं का वर्णन अनेक पवित्र ग्रंथों में मिलता है —
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि को मथुरा के कारागार में हुआ था। पिता वासुदेव और माता देवकी थीं। राजा कंस के अत्याचार से बचाने के लिए वासुदेव उन्हें यमुना पार करके गोकुल नंद-यशोदा के यहाँ ले गए।
जन्माष्टमी को भक्त दिनभर उपवास रखते हैं। मध्य रात्रि 12 बजे कृष्ण-जन्म का उत्सव होता है — मंदिरों में झूले सजाए जाते हैं, झाँकियाँ बनाई जाती हैं, 56 भोग चढ़ाया जाता है। महाराष्ट्र में "दही हांडी" की परंपरा प्रसिद्ध है।
श्रीमद्भगवद्गीता 700 श्लोकों का दिव्य ग्रंथ है, जो कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। इसमें 18 अध्याय हैं और कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग का अद्भुत समन्वय है। यह विश्व का सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक ग्रंथ माना जाता है।
इंद्र के कोप से ब्रज को बचाने के लिए कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली (कनिष्ठा) पर सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत उठाया था, जिसके नीचे पूरा गोकुल सुरक्षित रहा। इसी कारण उन्हें "गिरधर" (पर्वत धारण करने वाला) कहा जाता है।
राधा-कृष्ण का प्रेम सांसारिक प्रेम से परे है — यह आत्मा (राधा) और परमात्मा (कृष्ण) के मिलन का प्रतीक है। राधा कृष्ण की "आह्लादिनी शक्ति" मानी जाती हैं। इनका प्रेम निःस्वार्थ और दिव्य है — ब्रजवासी "राधे राधे" कहकर इसी प्रेम का स्मरण करते हैं।
श्रीकृष्ण की अष्ट पटरानियाँ (8 मुख्य रानियाँ) थीं — रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा। इसके अतिरिक्त 16,108 रानियाँ भी थीं, जिन्हें कृष्ण ने नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराकर सम्मान दिया था।
हाँ, श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं — परंतु वैष्णव परंपरा (विशेषकर भागवत संप्रदाय) में उन्हें "स्वयं भगवान" माना जाता है — अर्थात विष्णु से भी पूर्णतर। श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है — "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"।
घर पर कृष्ण की पूजा सरल है — सुबह स्नान के बाद कृष्ण की छवि या मूर्ति के समक्ष दीप जलाएँ, तुलसी पत्र और पीले फूल अर्पित करें, "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जाप करें। माखन-मिश्री या पंजीरी का भोग लगाएँ। एकादशी और जन्माष्टमी पर विशेष व्रत रखें।
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" — यह कलियुग का महामंत्र है। चैतन्य महाप्रभु ने इस मंत्र का प्रचार किया। मान्यता है कि कलियुग में नाम-जप ही मोक्ष का सबसे सरल मार्ग है। 16 शब्दों के इस मंत्र में सम्पूर्ण वेदों का सार है।
कृष्ण ने प्रतिज्ञा की थी कि महाभारत में वे शस्त्र नहीं उठाएँगे — केवल अर्जुन के सारथी बनेंगे। उन्होंने अपनी विशाल सेना (नारायणी सेना) कौरवों को दे दी और स्वयं निःशस्त्र पांडवों के पक्ष में रहे। इसी प्रकार उन्होंने सिद्ध किया कि शक्ति शस्त्र में नहीं, धर्म में है।
द्वारका गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित है। निकटतम हवाई अड्डा जामनगर (≈140 km) है। ओखा रेलवे स्टेशन (≈30 km) से अहमदाबाद, मुंबई की सीधी ट्रेनें हैं। द्वारका रेलवे स्टेशन भी कुछ शहरों से सीधा जुड़ा है। सड़क मार्ग से अहमदाबाद ≈430 km।
श्रीकृष्ण का सबसे बड़ा संदेश है — "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — अपना कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। साथ ही "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" — सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा। यह समर्पण और निष्काम कर्म का दिव्य संदेश है।