करवा चौथ विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला सबसे पवित्र निर्जला व्रत है। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिनें सूर्योदय से चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए व्रत रखती हैं, और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के हाथों से जल पीकर व्रत खोलती हैं। यह पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
सुहागिनें सूर्योदय से पहले सास द्वारा दी गई "सरगी" ग्रहण करती हैं और फिर दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं। दिन में सोलह श्रृंगार करती हैं — लाल या गुलाबी जोड़ा पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ, बिंदी, मंगलसूत्र और सिंदूर सजाती हैं। शाम को महिलाएं एकत्रित होकर सामूहिक पूजा करती हैं, करवा बदलती हैं, और कथा सुनती हैं। रात को छलनी से चंद्रमा के दर्शन करती हैं, फिर अपने पति का चेहरा देखती हैं और उनके हाथों से जल पीकर व्रत पूर्ण करती हैं।
करवा चौथ की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। एक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में जब पुरुष युद्ध के लिए सीमाओं पर जाते थे, तब उनकी पत्नियाँ उनकी सकुशल वापसी और दीर्घायु के लिए यह व्रत रखती थीं। पंजाब और उत्तर भारत के सैनिक परिवारों में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित थी। महाभारत काल से जुड़ी कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लाने हेतु यह व्रत किया था, जो इस भक्ति और समर्पण का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
प्राचीन समय में वीरावती नाम की एक सुंदर रानी थी, जो अपने सात भाइयों की इकलौती लाडली बहन थी। विवाह के पश्चात पहले करवा चौथ पर उसने मायके में निर्जला व्रत रखा। दिनभर भूख-प्यास से वह अत्यंत व्याकुल हो गई। उसके भाइयों से बहन की यह अवस्था देखी न गई।
भाइयों ने युक्ति निकाली — पीपल के वृक्ष पर दीपक जलाकर छलनी की आड़ में रखा और बहन से कहा कि चंद्रमा निकल आया है। वीरावती ने उसी को चंद्रमा मानकर अर्घ्य दिया और व्रत खोल लिया। परंतु व्रत भंग होते ही उसके पति की मृत्यु का समाचार आ गया।
दुःखी वीरावती ने पूरे वर्ष माँ गौरी की कठोर तपस्या की। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर माँ गौरी प्रकट हुईं और उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया। तभी से यह व्रत पूर्ण विधि-विधान से, चंद्रोदय के बाद ही खोला जाता है। द्रौपदी ने भी पांडवों की रक्षा के लिए यह व्रत रखा था और कृष्ण जी ने स्वयं उन्हें इस व्रत का महत्व बताया था।
- सरगी — सूर्योदय से पहले सास द्वारा दिया गया भोजन
- निर्जला व्रत — सूर्योदय से चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल
- सोलह श्रृंगार — मेहंदी, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र
- करवा बदलना — महिलाएं आपस में करवा (मिट्टी का बर्तन) बदलती हैं
- कथा वाचन — पूजा के समय करवा चौथ की कथा सुनना
- चंद्र दर्शन — छलनी से चंद्रमा देखना
- पति दर्शन — चंद्र दर्शन के बाद पति का चेहरा देखना
- व्रत पारण — पति के हाथों से जल पीकर व्रत खोलना
- सूर्योदय से पहले स्नान कर सरगी ग्रहण करें
- "मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये" का संकल्प लें
- नए वस्त्र (लाल/गुलाबी) पहनकर सोलह श्रृंगार करें
- शाम को पूजा स्थान सजाएं, चौकी पर माँ गौरी और गणेश की स्थापना करें
- करवा (मिट्टी का बर्तन) में जल, चावल, गेहूँ रखें
- दीपक, धूप जलाकर रोली, अक्षत, फूल अर्पित करें
- करवा चौथ की कथा सुनें (पूजा के बीच में)
- 14 पूड़ी, हलवा, मिठाई और दक्षिणा सास को भेंट करें (बायना)
- चंद्रोदय के बाद छलनी से चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखें
- चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के हाथों से जल पीकर व्रत खोलें
मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये ।
करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये ॥
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥
"सरगी" करवा चौथ की एक अनूठी और भावनात्मक परंपरा है। सूर्योदय से ठीक पहले (लगभग 4-5 बजे) सास अपनी बहू को विशेष भोजन देती है — जिसमें फेनी, मेवा, मिठाई, फल, पराठा, मठरी और श्रृंगार सामग्री शामिल होती है। यह सास का अपनी बहू को आशीर्वाद और प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि सरगी ग्रहण करने से दिनभर के निर्जला व्रत में ऊर्जा बनी रहती है। जिनकी सास नहीं होती, वे अपनी जेठानी, बड़ी बहन या किसी सुहागिन से सरगी ग्रहण कर सकती हैं।
करवा चौथ पर सुहागिनें "सोलह श्रृंगार" करती हैं, जो सुहाग का प्रतीक माने जाते हैं। ये 16 आभूषण-वस्त्र हैं — बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, चूड़ी, बिछिया, पायल, झुमका, नथ, मंगलसूत्र, गजरा, कमरबंद, अंगूठी, बाजूबंद, माथापट्टी और लाल या गुलाबी जोड़ा। मेहंदी जितनी गहरी रचती है, पति का प्रेम उतना ही गहरा माना जाता है। यह श्रृंगार न केवल सौंदर्य बढ़ाता है, बल्कि सुहाग की दीर्घायु का आशीर्वाद भी है।
- पंजाब — सबसे भव्य उत्सव, सरगी की समृद्ध परंपरा
- दिल्ली और हरियाणा — मेहंदी कार्यक्रम, सामूहिक पूजा
- उत्तर प्रदेश — "करक चतुर्थी" नाम से प्रसिद्ध, गौरी-गणेश पूजा
- राजस्थान — "करक चौथ", पारंपरिक राजस्थानी पोशाक
- मध्य प्रदेश — स्थानीय व्यंजन और लोकगीत
- हिमाचल प्रदेश — पहाड़ी परंपरा के साथ विशेष पूजा
- विदेश में बसे भारतीय — सामूहिक रूप से बड़े स्तर पर मनाते हैं
क्या करें
- सरगी सूर्योदय से पहले अवश्य ग्रहण करें
- लाल या गुलाबी वस्त्र पहनें
- सोलह श्रृंगार करें
- चंद्रमा को विधिवत अर्घ्य दें
- सामूहिक रूप से कथा सुनें
क्या न करें
- कैंची या सुई का उपयोग न करें (परंपरा)
- किसी का दिल न दुखाएं
- काले या सफेद वस्त्र न पहनें
- क्रोध और झूठ से बचें
- चंद्रोदय से पहले व्रत न खोलें