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|| श्रीमद्भगवद्गीता ||

अक्षरब्रह्मयोग

Akshar Brahma Yog
अक्षर ब्रह्म का योग
📜 28 श्लोक 📖 अध्याय 8
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 अध्याय सारांश

गीता का आठवाँ अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' अर्जुन के छह प्रश्नों — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ — के उत्तर से आरम्भ होता है। मुख्य विषय है अन्तकाल का स्मरण: मनुष्य मृत्यु के समय जिस भाव में रहता है, वही गति पाता है — इसलिए श्रीकृष्ण 'हर समय मुझे स्मरण कर और युद्ध भी कर' का उपदेश देते हैं। फिर वे 'ॐ' का जप और प्राण को भृकुटी के मध्य स्थिर करने की मरणकालीन योग-विधि बताते हैं। अध्याय में ब्रह्मा के दिन-रात (कल्प) का विराट काल-चक्र, अविनाशी 'अक्षर' परम धाम, और मृत्यु के दो मार्ग — शुक्ल (देवयान, अपुनरावृत्ति) और कृष्ण (पितृयान, पुनरावृत्ति) — का वर्णन है।

 Chapter Summary (English)

The eighth chapter, 'Akshara Brahma Yoga', begins by answering Arjuna's six questions — on Brahman, the Self, action, adhibhuta, adhidaiva and adhiyajna. Its central theme is remembrance at the time of death: whatever state one dwells in at the final moment, that state one attains — hence Krishna's teaching, 'Remember Me at all times and fight.' He then describes the practice of departing while chanting Om and fixing the life-breath between the eyebrows. The chapter unfolds the vast cosmic cycle of Brahma's day and night (the kalpa), the imperishable supreme abode, and the two paths after death — the bright (of no return) and the dark (of return).

श्लोक

कुल 28 श्लोक

1 श्लोक 8.1
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।।1।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसे कहा गया है और अधिदैव किसे कहते हैं?

English Meaning

Arjuna said: O Supreme Person, what is that Brahman? What is the Self (adhyatma)? What is action? What is called adhibhuta, and what is said to be adhidaiva?

2 श्लोक 8.2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।2।।
हिंदी अर्थ

हे मधुसूदन! इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और कैसे है? तथा संयमी पुरुष अन्तकाल में आपको किस प्रकार जानते हैं?

English Meaning

O Madhusudana, who is the adhiyajna here, and how does He dwell in this body? And how, at the time of death, are You to be known by the self-controlled?

3 श्लोक 8.3
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।3।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: परम अविनाशी तत्त्व 'ब्रह्म' है; जीव का अपना स्वरूप 'अध्यात्म' कहलाता है; और प्राणियों के भाव (शरीरादि) को उत्पन्न करने वाली जो सृष्टि-क्रिया है, वह 'कर्म' कही जाती है।

English Meaning

The Blessed Lord said: The supreme imperishable is Brahman; one's own essential nature is called the Self (adhyatma); and the creative force that brings beings into existence is called action (karma).

4 श्लोक 8.4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।।4।।
हिंदी अर्थ

नश्वर पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है; और हे देहधारियों में श्रेष्ठ! इस शरीर में मैं ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ।

English Meaning

The perishable manifestation is adhibhuta; the cosmic spirit is adhidaiva; and I alone, dwelling within, am the adhiyajna in this body, O best of the embodied.

5 श्लोक 8.5
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।5।।
हिंदी अर्थ

जो पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कोई संशय नहीं।

English Meaning

One who, at the hour of death, remembering Me alone, leaves the body — he attains My being; of this there is no doubt.

6 श्लोक 8.6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।6।।
हिंदी अर्थ

हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव में रमा रहा।

English Meaning

Whatever state one remembers when leaving the body at the end, that alone one attains, O son of Kunti — having been ever absorbed in that state.

7 श्लोक 8.7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।।7।।
हिंदी अर्थ

इसलिए हे अर्जुन! तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर; मुझमें मन-बुद्धि अर्पित करके तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।

English Meaning

Therefore, at all times remember Me and fight; with mind and intellect dedicated to Me, you shall surely come to Me.

8 श्लोक 8.8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।8।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! अभ्यास-योग से युक्त, इधर-उधर न भटकने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ पुरुष परम दिव्य पुरुष (परमेश्वर) को ही प्राप्त होता है।

English Meaning

With the mind disciplined by constant practice and not wandering to anything else, meditating on Him, one reaches the supreme divine Person, O Partha.

9-10 श्लोक 8.9 – 8.10
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।9।।
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।10।।
हिंदी अर्थ

जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारणकर्ता, अचिन्त्यरूप, सूर्य की तरह प्रकाशमान और अज्ञान-अंधकार से परे परमेश्वर का स्मरण करता है — वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकाल में योगबल से प्राण को भृकुटी के मध्य स्थिर करके, निश्चल मन से उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।

English Meaning

One who remembers the Omniscient, the Ancient, the Ruler of all, subtler than the subtle, the Sustainer of all, of inconceivable form, shining like the sun and beyond all darkness — such a devotee, at death, fixing the life-breath between the eyebrows by the power of yoga, with an unwavering mind, attains that supreme divine Person.

11 श्लोक 8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये।।11।।
हिंदी अर्थ

वेदवेत्ता जिसे अविनाशी 'अक्षर' कहते हैं, वीतराग संन्यासी जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसकी चाह में ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस परम पद को मैं तुझे संक्षेप में बताता हूँ।

English Meaning

That goal which the knowers of the Vedas call the Imperishable, which the passionless ascetics enter, and seeking which men practise celibacy — that supreme state I shall declare to you briefly.

12-13 श्लोक 8.12 – 8.13
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।12।।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।13।।
हिंदी अर्थ

सब इन्द्रिय-द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके, फिर प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित होकर, जो 'ॐ' इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

English Meaning

Closing all the gates of the senses, confining the mind in the heart, fixing the life-breath in the head, established in yogic concentration — one who departs uttering the single syllable Om, the Brahman, and remembering Me, attains the supreme goal.

14 श्लोक 8.14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।14।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! जो अनन्य मन से सदा-निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम का स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ।

English Meaning

For one who constantly remembers Me with undivided mind, O Partha, I am easily attained — for that ever-steadfast yogi.

15 श्लोक 8.15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।।15।।
हिंदी अर्थ

मुझे प्राप्त होकर महात्माजन फिर दुःखों के घर और क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि वे परम सिद्धि पा चुके होते हैं।

English Meaning

Having attained Me, the great souls, who have reached the highest perfection, are not reborn into this impermanent abode of sorrow.

16 श्लोक 8.16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।16।।
हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक के सब लोक पुनरावर्ती हैं (वहाँ से लौटना पड़ता है); पर हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर फिर जन्म नहीं होता।

English Meaning

All worlds, up to the realm of Brahma, are subject to return, O Arjuna; but on reaching Me, O son of Kunti, there is no rebirth.

17 श्लोक 8.17
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः।।17।।
हिंदी अर्थ

जो जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन हजार चतुर्युगों का और एक रात भी हजार चतुर्युगों की होती है — वही पुरुष काल के तत्त्व को जानने वाले हैं।

English Meaning

Those who know that a day of Brahma lasts a thousand ages, and his night also a thousand ages — they are the knowers of day and night.

18 श्लोक 8.18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।18।।
हिंदी अर्थ

ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सब प्रकट प्राणी अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं, और रात्रि के आने पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाते हैं।

English Meaning

At the coming of Brahma's day, all manifest beings arise from the unmanifest; and at the coming of night, they dissolve into that same unmanifest.

19 श्लोक 8.19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।।19।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! वही यह भूत-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर रात्रि के आगमन पर विवश होकर लीन होता है और दिन के आगमन पर फिर उत्पन्न हो जाता है।

English Meaning

This same multitude of beings, arising again and again, helplessly dissolves at the fall of night and is reborn at the break of day, O Partha.

20 श्लोक 8.20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।20।।
हिंदी अर्थ

उस अव्यक्त से भी परे एक और सनातन अव्यक्त भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।

English Meaning

But beyond this unmanifest there is another eternal unmanifest Being, which does not perish even when all beings perish.

21 श्लोक 8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।21।।
हिंदी अर्थ

उसी अव्यक्त को 'अक्षर' कहा गया है और उसी को परम गति कहते हैं; जिसे पाकर मनुष्य लौटते नहीं — वही मेरा परम धाम है।

English Meaning

That unmanifest, called the Imperishable, is declared the supreme goal; attaining which, none return — that is My supreme abode.

22 श्लोक 8.22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।22।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! जिसके भीतर सब प्राणी हैं और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, वह परम पुरुष केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है।

English Meaning

That supreme Person, O Partha, within whom all beings dwell and by whom all this is pervaded, is attainable only by undivided devotion.

23 श्लोक 8.23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।23।।
हिंदी अर्थ

हे भरतश्रेष्ठ! जिस काल में शरीर त्यागकर योगी न लौटने वाली गति को और जिस काल में लौटने वाली गति को प्राप्त होते हैं, उन दोनों मार्गों को मैं बताता हूँ।

English Meaning

I shall now tell you, O best of the Bharatas, the times at which yogis depart to return or not to return.

24 श्लोक 8.24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।24।।
हिंदी अर्थ

अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीने — इस मार्ग से जाने वाले ब्रह्मवेत्ता योगी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

English Meaning

Fire, light, day, the bright fortnight, the six months of the sun's northward course — departing then, the knowers of Brahman go to Brahman.

25 श्लोक 8.25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।25।।
हिंदी अर्थ

धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छह महीने — इस मार्ग से जाने वाला (सकाम) योगी चन्द्रमा की ज्योति पाकर, स्वर्ग भोगकर लौट आता है।

English Meaning

Smoke, night, the dark fortnight, the six months of the sun's southward course — departing then, the yogi attains the lunar light and returns.

26 श्लोक 8.26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।।26।।
हिंदी अर्थ

जगत के ये दो मार्ग — शुक्ल (देवयान) और कृष्ण (पितृयान) — सनातन माने गये हैं; एक से जाने वाला लौटता नहीं, दूसरे से जाने वाला फिर लौट आता है।

English Meaning

These two paths of the world — the bright and the dark — are held to be eternal; by one a person goes not to return, by the other he returns again.

27 श्लोक 8.27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।27।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता; इसलिए हे अर्जुन! तू हर समय योग से युक्त रह।

English Meaning

Knowing these two paths, O Partha, no yogi is deluded; therefore, at all times, be steadfast in yoga, O Arjuna.

28 श्लोक 8.28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।28।।
हिंदी अर्थ

वेद-पाठ, यज्ञ, तप और दान में जो पुण्यफल कहा गया है — इस रहस्य को जानने वाला योगी उन सबको लाँघकर सनातन परम पद को प्राप्त होता है।

English Meaning

The yogi who knows this surpasses all the merit promised for the study of the Vedas, for sacrifices, austerities and charity, and attains the supreme primal abode.

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