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|| श्रीमद्भगवद्गीता ||

भक्तियोग

Bhakti Yog
भक्ति का योग
📜 20 श्लोक 📖 अध्याय 12
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 अध्याय सारांश

गीता का बारहवाँ अध्याय 'भक्तियोग' पूरी गीता का हृदय है और सबसे छोटा (केवल 20 श्लोक) पर सबसे मधुर अध्याय है। अर्जुन पूछता है — सगुण (साकार) भगवान को भजने वाले श्रेष्ठ हैं या निर्गुण (निराकार) ब्रह्म को? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि दोनों लक्ष्य तक पहुँचते हैं, पर निराकार का मार्ग देहधारियों के लिए कठिन है; इसलिए सगुण भक्ति सहज और श्रेष्ठ है। फिर वे साधना की एक सुन्दर सीढ़ी बताते हैं — मन मुझमें लगाओ; न हो सके तो अभ्यास करो; वह न हो तो मेरे लिए कर्म करो; वह भी न हो तो कर्मफल का त्याग कर दो। अध्याय का अन्तिम भाग (13-20) उस 'प्रिय भक्त' के गुणों का अमर वर्णन है — अद्वेष्टा, मैत्र, करुण, निर्मम, निरहंकार, समदुःख-सुख, संतुष्ट, स्थिरबुद्धि।

 Chapter Summary (English)

The twelfth chapter, 'Bhakti Yoga', is the heart of the Gita — the shortest chapter (only 20 verses) yet the sweetest. Arjuna asks: who is better — those who worship the personal (saguna) God, or those who worship the formless (nirguna) Brahman? Krishna replies that both reach the goal, but the path of the formless is harder for embodied beings; loving devotion to the personal form is therefore easier and superior. He then gives a beautiful ladder of practice — fix your mind on Me; if you cannot, take up practice; if not that, work for Me; and if even that fails, renounce the fruit of action. The closing verses (13-20) are the timeless portrait of the 'dear devotee' — free from hatred, friendly, compassionate, without ego, even in joy and sorrow, content and steady of mind.

श्लोक

कुल 20 श्लोक

1 श्लोक 12.1
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।1।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: जो भक्त निरन्तर आपके (सगुण) भजन-ध्यान में लगे रहकर आपकी उपासना करते हैं, और जो केवल अविनाशी, अव्यक्त (निराकार) ब्रह्म को भजते हैं — इन दोनों में श्रेष्ठ योगवेत्ता कौन है?

English Meaning

Arjuna said: Of those devotees who, ever steadfast, worship You, and those who worship the imperishable, the unmanifest — which are the better knowers of yoga?

2 श्लोक 12.2
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।2।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: मुझमें मन लगाकर, निरन्तर युक्त रहकर, परम श्रद्धा से जो मुझ (सगुण) परमेश्वर की उपासना करते हैं — वे मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी हैं।

English Meaning

The Blessed Lord said: Those who fix their mind on Me and, ever steadfast, worship Me with supreme faith — them I regard as the most perfect in yoga.

3-5 श्लोक 12.3 – 12.5
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।3।।
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।4।।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।5।।
हिंदी अर्थ

किन्तु जो इन्द्रियों को वश में करके, सर्वत्र समबुद्धि रखते हुए, उस अनिर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, अचल और नित्य ब्रह्म की उपासना करते हैं — वे सब प्राणियों के हित में लगे रहकर मुझे ही प्राप्त होते हैं। पर अव्यक्त में लगे चित्त वालों का परिश्रम अधिक है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की गति कठिनाई से प्राप्त होती है।

English Meaning

But those who worship the Imperishable — the indefinable, unmanifest, all-pervading, inconceivable, unchanging, immovable and eternal — restraining the senses, even-minded everywhere and devoted to the welfare of all beings, they too attain Me. Yet greater is the toil of those whose minds are set on the unmanifest, for the unmanifest goal is hard for the embodied to reach.

6-7 श्लोक 12.6 – 12.7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।6।।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।7।।
हिंदी अर्थ

किन्तु जो मेरे परायण भक्त सब कर्म मुझे अर्पित करके, अनन्य भक्ति से मेरा ध्यान करते हुए उपासना करते हैं — हे पार्थ! मुझमें चित्त लगाने वाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार कर देता हूँ।

English Meaning

But those who, dedicating all actions to Me, intent on Me, worship Me with undivided devotion, meditating on Me — for them, O Partha, whose minds are absorbed in Me, I quickly become the deliverer from the ocean of death and rebirth.

8 श्लोक 12.8
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।8।।
हिंदी अर्थ

मुझमें ही मन लगा और मुझमें ही बुद्धि स्थिर कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा — इसमें कोई संशय नहीं।

English Meaning

Fix your mind on Me alone, place your intellect in Me; thereafter you shall dwell in Me alone — of this there is no doubt.

9 श्लोक 12.9
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।9।।
हिंदी अर्थ

यदि तू मन को मुझमें स्थिर करने में असमर्थ है, तो हे धनंजय! अभ्यास-योग के द्वारा मुझे पाने की इच्छा कर।

English Meaning

If you cannot fix your mind steadily on Me, then seek to reach Me through the yoga of practice, O Dhananjaya.

10 श्लोक 12.10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।10।।
हिंदी अर्थ

यदि अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने में लग जा; इस प्रकार मेरे लिए कर्म करते हुए भी तू सिद्धि (मेरी प्राप्ति) पा लेगा।

English Meaning

If you are unable even to practise, be intent on working for Me; even by doing actions for My sake, you will attain perfection.

11 श्लोक 12.11
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।11।।
हिंदी अर्थ

यदि मेरे आश्रित होकर यह भी करने में असमर्थ है, तो मन को वश में करके सब कर्मों के फल का त्याग कर दे।

English Meaning

But if you are unable to do even this, then, taking refuge in Me, self-controlled, renounce the fruit of all actions.

12 श्लोक 12.12
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।12।।
हिंदी अर्थ

(मर्म जाने बिना किये) अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से भी कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है — क्योंकि त्याग से तुरन्त परम शान्ति मिलती है।

English Meaning

Better than mere practice is knowledge; better than knowledge is meditation; and better than meditation is the renunciation of the fruit of action — for from such renunciation peace immediately follows.

13-14 श्लोक 12.13 – 12.14
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।14।।
हिंदी अर्थ

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता-अहंकार से रहित, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है; जो सदा संतुष्ट, संयमी, दृढ़ निश्चय वाला तथा मुझमें मन-बुद्धि अर्पित किये हुए है — ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

English Meaning

One who hates no being, is friendly and compassionate, free from possessiveness and ego, even in pain and pleasure, forgiving; ever content, self-controlled, firm in resolve, with mind and intellect dedicated to Me — such a devotee is dear to Me.

15 श्लोक 12.15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।15।।
हिंदी अर्थ

जिससे किसी को उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और उद्वेग से मुक्त है — वह भक्त मुझे प्रिय है।

English Meaning

One by whom the world is not disturbed, and who is not disturbed by the world, who is free from joy, envy, fear and anxiety — he is dear to Me.

16 श्लोक 12.16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।16।।
हिंदी अर्थ

जो आकांक्षा-रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, कुशल (दक्ष), पक्षपात-रहित और चिन्ता-रहित है, तथा सब (सकाम) आरम्भों का त्यागी है — ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

English Meaning

One who is free from wants, pure, capable, indifferent, untroubled, and who has given up all selfish undertakings — such a devotee is dear to Me.

17 श्लोक 12.17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।17।।
हिंदी अर्थ

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, तथा जो शुभ-अशुभ दोनों का (फल) त्याग कर देता है — ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

English Meaning

One who neither rejoices nor hates, neither grieves nor desires, who has renounced both good and evil — such a devotee is dear to Me.

18-19 श्लोक 12.18 – 12.19
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।18।।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।19।।
हिंदी अर्थ

जो शत्रु-मित्र में, मान-अपमान में, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है, आसक्ति-रहित है; जो निन्दा-स्तुति को समान मानता है, मननशील है, जो भी मिल जाए उसमें संतुष्ट है, घर-स्थान में ममता-रहित और स्थिरबुद्धि है — ऐसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

English Meaning

Alike toward foe and friend, in honour and dishonour, in cold and heat, in pleasure and pain, free from attachment; regarding blame and praise as equal, restrained in speech, content with whatever comes, without fixed abode, steady in mind — such a devotee is dear to Me.

20 श्लोक 12.20
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः।।20।।
हिंदी अर्थ

किन्तु जो श्रद्धालु भक्त मेरे परायण होकर इस ऊपर बताये धर्ममय अमृत का निष्काम प्रेम से सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त ही प्रिय हैं।

English Meaning

But those devotees who, full of faith and holding Me as the supreme goal, follow this nectar of dharma as declared — they are exceedingly dear to Me.

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