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|| श्रीमद्भगवद्गीता ||

आत्मसंयमयोग

Atma Sanyam Yog
ध्यान का योग
📜 47 श्लोक 📖 अध्याय 6
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 अध्याय सारांश

गीता का छठा अध्याय 'आत्मसंयमयोग' (ध्यानयोग) मन को साधने की कला सिखाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु — दोनों वह स्वयं ही है; जिसने अपने मन को जीत लिया, उसी का उद्धार होता है। फिर वे ध्यान की विधि बताते हैं — एकान्त, स्थिर आसन, सीधा शरीर, संयमित आहार-निद्रा — और 'वायुरहित दीपक' की प्रसिद्ध उपमा देते हैं। समदर्शन का शिखर यहीं आता है — 'जो सबमें मुझे और मुझमें सबको देखता है'। अन्त में अर्जुन मन की चंचलता का प्रश्न उठाता है; भगवान उत्तर देते हैं कि मन अभ्यास और वैराग्य से वश में आता है, और योगभ्रष्ट का भी नाश नहीं होता — वह अगले जन्म में फिर साधना आगे बढ़ाता है।

 Chapter Summary (English)

The sixth chapter, 'Atma Samyama Yoga' (the Yoga of Meditation), teaches the art of mastering the mind. Krishna says that a person is his own greatest friend and his own worst enemy; only one who conquers the mind uplifts himself. He then describes the method of meditation — solitude, a steady seat, an erect body, moderation in food and sleep — and gives the famous image of a 'lamp in a windless place'. The peak of equal vision appears here: 'one who sees Me in all and all in Me'. Finally Arjuna raises the problem of the restless mind; Krishna replies that it is mastered through practice and dispassion, and that even one who falls from yoga is never destroyed — he resumes the path in a future life.

श्लोक

कुल 47 श्लोक

1 श्लोक 6.1
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।1।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि (यज्ञ) त्याग देने वाला संन्यासी या केवल क्रिया छोड़ देने वाला योगी नहीं होता।

English Meaning

The Blessed Lord said: One who performs his duty without depending on its fruit — he is the true renunciant and yogi; not the one who merely gives up the sacred fire or abstains from action.

2 श्लोक 6.2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।2।।
हिंदी अर्थ

हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान; क्योंकि संकल्पों (कामनाओं) का त्याग किये बिना कोई भी योगी नहीं बन सकता।

English Meaning

Know that what they call renunciation is the same as yoga, O Pandava; for no one becomes a yogi without giving up selfish intentions.

3 श्लोक 6.3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।3।।
हिंदी अर्थ

योग में आरूढ़ होने के इच्छुक मननशील पुरुष के लिए निष्काम कर्म ही साधन कहा जाता है; और योग में आरूढ़ हो जाने पर उसी के लिए सब संकल्पों का त्याग (शम) ही साधन कहा जाता है।

English Meaning

For the sage wishing to climb to yoga, action is said to be the means; for one who has attained yoga, stillness (quieting of desires) is the means.

4 श्लोक 6.4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।4।।
हिंदी अर्थ

जब मनुष्य न इन्द्रिय-भोगों में और न कर्मों में आसक्त रहता है, तब वह सब संकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहलाता है।

English Meaning

When one is attached neither to sense-objects nor to actions, having renounced all selfish intentions, then one is said to have attained yoga.

5 श्लोक 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।
हिंदी अर्थ

मनुष्य अपने द्वारा ही अपना उद्धार करे, अपने को गिरने न दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

English Meaning

Let one lift oneself by oneself, and not degrade oneself; for the self alone is one's friend, and the self alone is one's enemy.

6 श्लोक 6.6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6।।
हिंदी अर्थ

जिसने अपने मन-इन्द्रियों सहित स्वयं को जीत लिया है, उसके लिए वह स्वयं ही मित्र है; पर जिसने स्वयं को नहीं जीता, उसके लिए वह स्वयं ही शत्रु की तरह बरतता है।

English Meaning

For one who has conquered himself, the self is a friend; but for one who has not, the very self behaves like an enemy.

7 श्लोक 6.7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।7।।
हिंदी अर्थ

सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में जिसका अन्तःकरण शान्त और स्थिर है, ऐसे आत्मविजयी पुरुष के ज्ञान में परमात्मा भलीभाँति स्थित रहते हैं।

English Meaning

For the self-controlled and serene one, the Supreme Self is steadily present — in cold and heat, pleasure and pain, honour and dishonour alike.

8 श्लोक 6.8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।8।।
हिंदी अर्थ

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जो विकाररहित और जितेन्द्रिय है तथा जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान हैं — वह योगी 'युक्त' (भगवत्प्राप्त) कहा जाता है।

English Meaning

The yogi whose mind is satisfied with knowledge and realization, who is unwavering and master of the senses, to whom clay, stone and gold are alike — he is said to be steadfast.

9 श्लोक 6.9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।9।।
हिंदी अर्थ

जो सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी और बन्धु में, तथा धर्मात्माओं और पापियों में भी समान भाव रखता है, वह श्रेष्ठ है।

English Meaning

One who is even-minded toward a well-wisher, friend, foe, neutral, arbiter, the hateful and the kinsman, and toward the saintly and the sinful alike, excels.

10 श्लोक 6.10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।10।।
हिंदी अर्थ

मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशा और संग्रह से रहित योगी एकान्त में अकेला रहकर अपने मन को निरन्तर परमात्मा में लगाये।

English Meaning

Let the yogi, alone in solitude, with mind and body controlled, free from desire and possessions, constantly fix the mind on the Supreme.

11-12 श्लोक 6.11 – 6.12
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।11।।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।12।।
हिंदी अर्थ

शुद्ध भूमि पर — जिस पर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हों, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा — अपना स्थिर आसन लगाकर, उस पर बैठकर, मन और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

English Meaning

On clean ground, having set a firm seat — neither too high nor too low, covered with kusha grass, a deerskin and a cloth — sitting there, making the mind one-pointed and controlling the activity of mind and senses, one should practise yoga for self-purification.

13-14 श्लोक 6.13 – 6.14
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।13।।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।14।।
हिंदी अर्थ

शरीर, सिर और गले को सीधा-अचल रखकर, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर, इधर-उधर न देखता हुआ, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित, भयरहित और शान्त अन्तःकरण वाला योगी मन को रोककर मुझमें चित्त लगाये और मेरे परायण होकर बैठे।

English Meaning

Holding the body, head and neck erect and still, gazing at the tip of one's nose without looking around, serene and fearless, firm in the vow of celibacy, restraining the mind, the yogi should sit absorbed in Me, devoted to Me.

15 श्लोक 6.15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।15।।
हिंदी अर्थ

इस प्रकार मन को वश में रखकर आत्मा को निरन्तर मुझमें लगाने वाला योगी मुझमें स्थित परम शान्ति — मोक्षरूप परमानन्द — को प्राप्त होता है।

English Meaning

Thus ever uniting the mind with the Self, the yogi of controlled mind attains the supreme peace of liberation that abides in Me.

16 श्लोक 6.16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।16।।
हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! यह योग न बहुत खाने वाले का सधता है, न बिलकुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागते रहने वाले का।

English Meaning

Yoga is not for one who eats too much, nor for one who fasts excessively; nor for one who sleeps too much, nor for one who stays awake too long, O Arjuna.

17 श्लोक 6.17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।17।।
हिंदी अर्थ

जो आहार-विहार में, कर्मों में चेष्टा में, तथा सोने-जागने में संयमित (यथायोग्य) है — उसी का यह योग दुःखों का नाश करने वाला सिद्ध होता है।

English Meaning

For one moderate in food and recreation, balanced in action, and regulated in sleep and waking — yoga becomes the destroyer of sorrow.

18 श्लोक 6.18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।18।।
हिंदी अर्थ

जब भलीभाँति वश में किया हुआ चित्त केवल परमात्मा में ही स्थिर हो जाता है, तब सब कामनाओं से रहित वह पुरुष 'युक्त' (योगी) कहा जाता है।

English Meaning

When the well-controlled mind rests in the Self alone, free from longing for all desires, then one is called united in yoga.

19 श्लोक 6.19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।19।।
हिंदी अर्थ

जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक नहीं हिलता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे, वश में किये हुए चित्त वाले योगी की दी गयी है।

English Meaning

As a lamp in a windless place does not flicker — such is the image of the yogi of controlled mind, absorbed in meditation on the Self.

20-23 श्लोक 6.20 – 6.23
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।20।।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।।21।।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।22।।
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।23।।
हिंदी अर्थ

योग के अभ्यास से वश में किया हुआ चित्त जिस अवस्था में शान्त हो जाता है, और जहाँ शुद्ध बुद्धि से परमात्मा को साक्षात् करता हुआ साधक आत्मा में ही संतुष्ट रहता है; इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध बुद्धि से ग्रहण होने योग्य जो अनन्त आनन्द है उसे जहाँ अनुभव करता है और परमात्मा से कभी विचलित नहीं होता; जिस लाभ को पाकर उससे बड़ा कोई लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर बड़े से बड़े दुःख से भी नहीं डिगता — दुःख के संयोग से रहित इसी अवस्था को 'योग' जानना चाहिए; और इसे धैर्य तथा उत्साह से, बिना ऊबे, निश्चयपूर्वक करना चाहिए।

English Meaning

When the mind, restrained by the practice of yoga, comes to rest, and seeing the Self by the Self one is content in the Self; when one knows that infinite joy, beyond the senses and grasped only by pure reason, and never moves from it; on gaining which one regards no other gain as greater, and established in which one is not shaken even by the heaviest sorrow — that severance from union with pain is to be known as yoga, to be practised with determination and an undespairing heart.

24-25 श्लोक 6.24 – 6.25
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः।।24।।
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।25।।
हिंदी अर्थ

संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को पूरी तरह त्यागकर, मन के द्वारा सभी ओर से इन्द्रिय-समूह को रोककर, धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे-धीरे उपरति को प्राप्त हो; और मन को परमात्मा में स्थिर करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।

English Meaning

Abandoning entirely all desires born of intention, and restraining the senses from every side by the mind, let one gradually attain stillness by a resolute intellect; fixing the mind on the Self, one should think of nothing else.

26 श्लोक 6.26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।26।।
हिंदी अर्थ

यह चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस विषय की ओर भागता है, उस-उस से इसे हटाकर बार-बार परमात्मा में ही लाकर वश में करे।

English Meaning

Whenever the restless, unsteady mind wanders away, one should draw it back and bring it under the control of the Self.

27 श्लोक 6.27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।27।।
हिंदी अर्थ

जिसका मन भलीभाँति शान्त है, जिसका रजोगुण शान्त हो गया है और जो पापरहित होकर ब्रह्म से एकाकार हो गया है — ऐसे योगी को उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।

English Meaning

Supreme joy comes to the yogi whose mind is at peace, whose passion is quieted, who is sinless and has become one with Brahman.

28 श्लोक 6.28
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।28।।
हिंदी अर्थ

इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाने वाला पापरहित योगी सहज ही ब्रह्म-स्पर्श का अनन्त आनन्द प्राप्त कर लेता है।

English Meaning

Thus ever uniting the self with the Supreme, the sinless yogi easily enjoys the boundless bliss of contact with Brahman.

29 श्लोक 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।29।।
हिंदी अर्थ

समभाव से देखने वाला योगयुक्त पुरुष आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में स्थित देखता है।

English Meaning

One united in yoga, seeing the same everywhere, beholds the Self in all beings and all beings in the Self.

30 श्लोक 6.30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।30।।
हिंदी अर्थ

जो मुझे सब प्राणियों में और सब प्राणियों को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता और वह मेरे लिए कभी ओझल नहीं होता।

English Meaning

One who sees Me everywhere and sees all things in Me — to him I am never lost, nor is he ever lost to Me.

31 श्लोक 6.31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।31।।
हिंदी अर्थ

जो एकत्व-भाव में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझको भजता है, वह योगी किसी भी प्रकार बरतता हुआ भी मुझमें ही रहता है।

English Meaning

The yogi who, established in oneness, worships Me dwelling in all beings — however he lives, he dwells in Me.

32 श्लोक 6.32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।।32।।
हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! जो योगी अपनी तरह सब प्राणियों में समभाव से देखता है, और सुख-दुःख को भी सबमें समान देखता है, वह परम श्रेष्ठ माना गया है।

English Meaning

One who sees all beings as equal to oneself, O Arjuna, whether in pleasure or in pain — that yogi is regarded as the highest.

33 श्लोक 6.33
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।33।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! समभाव वाला जो यह योग आपने बताया है, मन के चंचल होने के कारण मुझे इसकी स्थिर स्थिति दिखाई नहीं देती।

English Meaning

Arjuna said: This yoga of equanimity that You have described, O Madhusudana — because of the restlessness of the mind, I do not see how it can remain steady.

34 श्लोक 6.34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।34।।
हिंदी अर्थ

हे कृष्ण! मन बड़ा चंचल, उद्वेग पैदा करने वाला, बलवान और दृढ़ है। उसे वश में करना मुझे वायु को रोकने जैसा अत्यन्त कठिन लगता है।

English Meaning

The mind is restless, turbulent, strong and obstinate, O Krishna; to control it seems to me as hard as to control the wind.

35 श्लोक 6.35
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।35।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; पर हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ ही जाता है।

English Meaning

The Blessed Lord said: Undoubtedly, O mighty-armed, the mind is restless and hard to curb; but by practice and dispassion, O son of Kunti, it can be controlled.

36 श्लोक 6.36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।36।।
हिंदी अर्थ

जिसका मन वश में नहीं है उसके लिए योग पाना कठिन है; पर जिसका मन वश में है और जो प्रयत्नशील है, वह उचित साधन से इसे प्राप्त कर सकता है — यह मेरा मत है।

English Meaning

Yoga is hard to attain for one of uncontrolled mind; but for one of controlled mind who strives, it can be attained by proper means — this is My view.

37 श्लोक 6.37
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।37।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो योग में श्रद्धा तो रखता है पर संयमी नहीं है, और जिसका मन अन्तकाल में योग से डिग गया — ऐसा साधक योग की सिद्धि न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?

English Meaning

Arjuna said: O Krishna, one who has faith but is not self-controlled, whose mind wanders from yoga and who fails to reach its perfection — what end does he meet?

38 श्लोक 6.38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।38।।
हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयहीन पुरुष, छिन्न-भिन्न बादल की तरह, दोनों ओर से (इस लोक और परलोक से) भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?

English Meaning

Fallen from both, without support and bewildered on the path to Brahman — does he not perish like a scattered cloud, O mighty-armed?

39 श्लोक 6.39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।39।।
हिंदी अर्थ

हे कृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह मिटाने योग्य आप ही हैं; क्योंकि आपके सिवा इस संशय को दूर करने वाला और कोई संभव नहीं।

English Meaning

You alone, O Krishna, are able to dispel this doubt of mine completely; for none other than You can remove it.

40 श्लोक 6.40
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।।40।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: हे पार्थ! ऐसे पुरुष का न इस लोक में नाश होता है न परलोक में; क्योंकि हे प्यारे! कल्याण के कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

English Meaning

The Blessed Lord said: O Partha, neither here nor hereafter is there destruction for him; for no one who does good, dear one, ever comes to grief.

41 श्लोक 6.41
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।41।।
हिंदी अर्थ

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों (स्वर्गादि) को प्राप्त होकर वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर, फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

English Meaning

Having attained the worlds of the righteous and dwelt there for countless years, the fallen yogi is reborn in the house of the pure and prosperous.

42 श्लोक 6.42
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।42।।
हिंदी अर्थ

अथवा वह ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है; पर इस प्रकार का जन्म संसार में निःसंदेह अत्यन्त दुर्लभ है।

English Meaning

Or he is born into a family of wise yogis; but such a birth is very rare to obtain in this world.

43 श्लोक 6.43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।43।।
हिंदी अर्थ

वहाँ वह पूर्व जन्म के बुद्धि-संस्कारों (योग के संस्कारों) को सहज ही पुनः प्राप्त कर लेता है, और हे कुरुनन्दन! उनके बल से सिद्धि के लिए पहले से भी अधिक प्रयत्न करता है।

English Meaning

There he regains the mental impressions of his former life, and strives all the more for perfection, O joy of the Kurus.

44 श्लोक 6.44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।44।।
हिंदी अर्थ

पूर्वजन्म के उसी अभ्यास के बल से वह विवश होकर भी भगवान की ओर खिंच जाता है; और योग का जिज्ञासु भी वेदों में कहे सकाम कर्मफल को लाँघ जाता है।

English Meaning

By that former practice he is carried onward even against his will; and even a mere seeker of yoga goes beyond the ritual word of the Vedas.

45 श्लोक 6.45
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।।45।।
हिंदी अर्थ

किन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी अनेक जन्मों के संस्कारों के बल से इसी जन्म में पूर्ण शुद्ध होकर परम गति को प्राप्त कर लेता है।

English Meaning

But the yogi who strives with effort, purified of sin and perfected through many births, then reaches the supreme goal.

46 श्लोक 6.46
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।46।।
हिंदी अर्थ

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन! तू योगी बन।

English Meaning

The yogi is greater than the ascetics, greater than the men of mere learning, and greater than the men of action; therefore be a yogi, O Arjuna.

47 श्लोक 6.47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः।।47।।
हिंदी अर्थ

सब योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझे निरन्तर भजता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी है।

English Meaning

And of all yogis, the one who worships Me with faith, his inner self absorbed in Me — him I regard as the most devoted of all.

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