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|| श्रीमद्भगवद्गीता ||

कर्मसंन्यासयोग

Karm Sanyas Yog
कर्म-संन्यास का योग
📜 29 श्लोक 📖 अध्याय 5
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 अध्याय सारांश

गीता का पाँचवाँ अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' अर्जुन के इस प्रश्न से शुरू होता है कि कर्म-संन्यास (ज्ञानयोग) और कर्मयोग — दोनों में से कौन श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं, पर कर्मयोग सहज होने से बेहतर है। सच्चा संन्यासी वही है जो राग-द्वेष से ऊपर उठ गया है। वे समझाते हैं कि ज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' का भाव छोड़ देता है, सब कर्म परमात्मा को अर्पित करता है, और कमल-पत्ते की तरह पाप से अछूता रहता है। अध्याय समभाव (ब्राह्मण से चाण्डाल तक सम दृष्टि), काम-क्रोध के वेग को जीतने और अन्त में संक्षिप्त ध्यानयोग का वर्णन करके परम शान्ति पर समाप्त होता है।

 Chapter Summary (English)

The fifth chapter, 'Karma Sanyasa Yoga', opens with Arjuna's question: which is better — renunciation of action (the path of knowledge) or karma-yoga? Krishna replies that both lead to the same goal, but karma-yoga, being easier, is superior. The true renunciant is one who has risen above attachment and aversion. He explains that the wise drop the sense of 'I am the doer', dedicate all actions to the Supreme, and remain untouched by sin like a lotus leaf by water. The chapter speaks of even-mindedness — seeing the same Self in a Brahmin and an outcaste — conquering the surge of desire and anger, and closes with a brief account of meditation leading to the peace of Brahman.

श्लोक

कुल 29 श्लोक

1 श्लोक 5.1
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।1।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! आप एक ओर कर्मों के संन्यास की और दूसरी ओर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए निश्चित कल्याणकारी हो, वही बताइए।

English Meaning

Arjuna said: O Krishna, You praise the renunciation of actions, and again You praise karma-yoga. Tell me decisively which one of these two is better for me.

2 श्लोक 5.2
श्रीभगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।2।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: कर्म-संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण देने वाले हैं; पर इन दोनों में कर्मयोग, संन्यास की अपेक्षा सहज और श्रेष्ठ है।

English Meaning

The Blessed Lord said: Both renunciation of action and karma-yoga lead to the highest good; but of the two, karma-yoga is superior to mere renunciation.

3 श्लोक 5.3
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।3।।
हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना — ऐसे कर्मयोगी को सदा संन्यासी ही समझना चाहिए, क्योंकि राग-द्वेष से रहित पुरुष सहज ही बन्धन से मुक्त हो जाता है।

English Meaning

One who neither hates nor desires should be known as ever-renounced, O mighty-armed; free from the pairs of opposites, he is easily released from bondage.

4 श्लोक 5.4
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।4।।
हिंदी अर्थ

संन्यास और कर्मयोग को अलग-अलग फल देने वाला केवल अज्ञानी कहते हैं, ज्ञानी नहीं; क्योंकि इनमें से किसी एक में भी भलीभाँति स्थित पुरुष दोनों का फल पा लेता है।

English Meaning

Only the ignorant, not the wise, speak of knowledge and action as separate; one well established in either obtains the fruit of both.

5 श्लोक 5.5
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5।।
हिंदी अर्थ

ज्ञानयोगियों को जो परम स्थान मिलता है, वही कर्मयोगियों को भी मिलता है। इसलिए जो ज्ञानयोग और कर्मयोग को फल में एक देखता है, वही सही देखता है।

English Meaning

The state reached by men of knowledge is also reached by men of action; one who sees knowledge and action as one truly sees.

6 श्लोक 5.6
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।6।।
हिंदी अर्थ

किन्तु हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना केवल संन्यास प्राप्त करना कठिन है; भगवान का मनन करने वाला कर्मयोगी शीघ्र ही परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

English Meaning

But renunciation without karma-yoga is hard to attain, O mighty-armed; the sage devoted to yoga soon reaches Brahman.

7 श्लोक 5.7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।7।।
हिंदी अर्थ

जिसका मन वश में है, जो जितेन्द्रिय और विशुद्ध अन्तःकरण वाला है, तथा सब प्राणियों का आत्मा ही जिसका आत्मा बन गया है — ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

English Meaning

Devoted to yoga, pure in mind, self-controlled and master of the senses, whose self has become the Self of all beings — though acting, he is not tainted.

8-9 श्लोक 5.8 – 5.9
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्।।8।।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।9।।
हिंदी अर्थ

तत्त्ववेत्ता सांख्ययोगी देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, चलते, सोते, साँस लेते, बोलते, त्यागते, ग्रहण करते तथा आँखें खोलते-मूँदते हुए भी यही मानता है कि 'मैं कुछ नहीं करता' — क्योंकि वह जानता है कि सब इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में बरत रही हैं।

English Meaning

The knower of truth thinks, 'I do nothing at all' — even while seeing, hearing, touching, smelling, eating, walking, sleeping, breathing, speaking, releasing, grasping, and opening or closing the eyes — knowing it is only the senses acting among their objects.

10 श्लोक 5.10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।10।।
हिंदी अर्थ

जो आसक्ति छोड़कर सब कर्म परमात्मा को अर्पित करके करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता जल से।

English Meaning

One who acts offering all actions to Brahman, having abandoned attachment, is untouched by sin, as a lotus leaf by water.

11 श्लोक 5.11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।11।।
हिंदी अर्थ

कर्मयोगी ममता छोड़कर केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

English Meaning

Abandoning attachment, the yogis perform action with body, mind, intellect and senses alone, only for self-purification.

12 श्लोक 5.12
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।12।।
हिंदी अर्थ

कर्मयोगी फल की आसक्ति छोड़कर भगवत्प्राप्तिरूप स्थायी शान्ति पाता है; पर सकाम पुरुष कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त हो बँध जाता है।

English Meaning

The steadfast one, abandoning the fruit of action, attains lasting peace; but the unsteady, driven by desire and attached to results, is bound.

13 श्लोक 5.13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।13।।
हिंदी अर्थ

अपने अन्तःकरण को वश में रखने वाला पुरुष न करता हुआ न करवाता हुआ, नौ द्वारों वाले इस शरीररूपी घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक स्थित रहता है।

English Meaning

Renouncing all actions by the mind, the self-controlled dweller rests happily in the city of nine gates (the body), neither acting nor causing action.

14 श्लोक 5.14
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।14।।
हिंदी अर्थ

परमेश्वर न मनुष्यों के कर्तापन की रचना करते हैं, न कर्मों की, और न कर्मफल के संयोग की — यह सब तो स्वभाव (प्रकृति) ही करता है।

English Meaning

The Lord creates neither agency, nor actions, nor the union of action with its fruit for people; it is nature that operates.

15 श्लोक 5.15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।15।।
हिंदी अर्थ

सर्वव्यापी परमेश्वर न किसी के पाप को ग्रहण करता है न पुण्य को; ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी से सब प्राणी मोहित होते हैं।

English Meaning

The all-pervading Lord takes on neither the sin nor the merit of anyone; knowledge is veiled by ignorance, and thereby beings are deluded.

16 श्लोक 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।।16।।
हिंदी अर्थ

किन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की भाँति उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है।

English Meaning

But for those whose ignorance is destroyed by knowledge of the Self, that knowledge, like the sun, reveals the Supreme.

17 श्लोक 5.17
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।17।।
हिंदी अर्थ

जिनका मन-बुद्धि उसी परमात्मा में तल्लीन है, जो उसी में स्थित और उसी के परायण हैं, ऐसे पुरुष ज्ञान से पाप-रहित होकर परम गति (अपुनरावृत्ति) को प्राप्त होते हैं।

English Meaning

With mind and intellect absorbed in That, established in That, devoted to That as the goal — they go, cleansed of sin by knowledge, to the state of no return.

18 श्लोक 5.18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।18।।
हिंदी अर्थ

ज्ञानीजन विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण में, गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।

English Meaning

The wise see with equal eye a learned and humble Brahmin, a cow, an elephant, a dog, and an outcaste.

19 श्लोक 5.19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।19।।
हिंदी अर्थ

जिनका मन समभाव में स्थिर है, उन्होंने इसी जीवन में संसार जीत लिया; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

English Meaning

Even here, the world is conquered by those whose mind rests in equanimity; for Brahman is flawless and even, and so they are established in Brahman.

20 श्लोक 5.20
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।20।।
हिंदी अर्थ

जो प्रिय पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, ऐसा स्थिरबुद्धि, संशयरहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित रहता है।

English Meaning

One who neither rejoices on obtaining the pleasant nor grieves on the unpleasant — that steady-minded, undeluded knower of Brahman rests in Brahman.

21 श्लोक 5.21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।21।।
हिंदी अर्थ

बाहरी विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित आनन्द को पाता है; फिर ब्रह्म-ध्यानरूप योग में स्थित होकर वह अक्षय आनन्द का अनुभव करता है।

English Meaning

With the self unattached to external contacts, one finds the joy within; united with Brahman through yoga, one enjoys imperishable bliss.

22 श्लोक 5.22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।22।।
हिंदी अर्थ

इन्द्रिय-विषयों के संयोग से उत्पन्न भोग — चाहे सुखद लगें — वास्तव में दुःख के ही कारण हैं और आदि-अन्त वाले (अनित्य) हैं; इसलिए हे कौन्तेय! विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।

English Meaning

The pleasures born of sense-contact are only sources of pain, with a beginning and an end; the wise, O son of Kunti, do not delight in them.

23 श्लोक 5.23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।23।।
हिंदी अर्थ

जो साधक शरीर छूटने से पहले ही काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है।

English Meaning

One who can withstand, here before leaving the body, the urge born of desire and anger — he is a yogi, and he is happy.

24 श्लोक 5.24
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।24।।
हिंदी अर्थ

जो अपने भीतर ही सुख वाला, भीतर ही रमने वाला और भीतर ही प्रकाश (ज्ञान) वाला है, ऐसा योगी ब्रह्म के साथ एक होकर शान्त ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है।

English Meaning

One who finds happiness within, delights within, and is illumined within — that yogi, becoming one with Brahman, attains the peace of Brahman.

25 श्लोक 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।25।।
हिंदी अर्थ

जिनके पाप क्षीण हो गये, जिनके संशय ज्ञान से मिट गये, जो सब प्राणियों के हित में लगे हैं और जिनका मन वश में है — ऐसे ऋषि शान्त ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होते हैं।

English Meaning

The seers whose sins are destroyed, whose doubts are dispelled, who are self-controlled and devoted to the welfare of all beings, attain the peace of Brahman.

26 श्लोक 5.26
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।26।।
हिंदी अर्थ

काम-क्रोध से रहित, जीते हुए मन वाले और आत्मज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर शान्त ब्रह्म-निर्वाण ही परिपूर्ण रहता है।

English Meaning

For the self-controlled sages, free from desire and anger, who have realized the Self, the peace of Brahman exists all around.

27-28 श्लोक 5.27 – 5.28
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।।27।।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।।28।।
हिंदी अर्थ

बाहरी विषयों को बाहर ही रखकर, दृष्टि को भृकुटी के मध्य स्थिर करके, और नासिका में बहने वाले प्राण-अपान को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि वश में हैं, ऐसा इच्छा-भय-क्रोध से रहित मोक्ष-परायण मुनि सदा मुक्त ही है।

English Meaning

Shutting out external objects, fixing the gaze between the eyebrows, balancing the in-breath and out-breath in the nostrils, with senses, mind and intellect controlled — the sage bent on liberation, free from desire, fear and anger, is ever free.

29 श्लोक 5.29
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।29।।
हिंदी अर्थ

मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महान् ईश्वर, और सब प्राणियों का निःस्वार्थ हितैषी जानकर मेरा भक्त परम शान्ति पा लेता है।

English Meaning

Knowing Me as the enjoyer of all sacrifices and austerities, the great Lord of all worlds, and the selfless friend of all beings — one attains peace.

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