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|| श्रीमद्भगवद्गीता ||

श्रद्धात्रयविभागयोग

Shraddhatraya Vibhag Yog
तीन प्रकार की श्रद्धा का योग
📜 28 श्लोक 📖 अध्याय 17
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 अध्याय सारांश

गीता का सत्रहवाँ अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' श्रद्धा के तीन प्रकारों — सात्त्विक, राजस और तामस — का विवेचन करता है। अर्जुन पूछता है कि जो शास्त्र-विधि छोड़कर केवल श्रद्धा से पूजा करते हैं उनकी क्या गति होती है। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि श्रद्धा मनुष्य के स्वभाव के अनुसार होती है — 'जैसी श्रद्धा, वैसा मनुष्य'। फिर वे आहार, यज्ञ, तप और दान — हर एक के तीन-तीन प्रकार बताते हैं। तप के तीन स्तर भी समझाते हैं — शरीर, वाणी और मन का तप। अध्याय का अन्त 'ॐ तत् सत्' — ब्रह्म के त्रिविध नाम — के विवेचन से होता है, और यह कहकर कि श्रद्धा के बिना किया कोई भी कर्म 'असत्' है, न इस लोक में फल देता है न परलोक में।

 Chapter Summary (English)

The seventeenth chapter, 'Shraddha-Traya-Vibhaga Yoga', analyses the three kinds of faith — sattvic, rajasic and tamasic. Arjuna asks about the state of those who worship with faith but without following scripture. Krishna replies that faith accords with one's nature — 'as is a person's faith, so is he'. He then classifies food, sacrifice, austerity and charity each into three types. He also explains the three levels of austerity — of body, speech and mind. The chapter closes with the meaning of 'Om Tat Sat' — the threefold name of Brahman — and the teaching that any act done without faith is 'Asat', bearing no fruit here or hereafter.

श्लोक

कुल 28 श्लोक

1 श्लोक 17.1
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।1।।
हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! जो शास्त्र-विधि छोड़कर केवल श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कैसी है — सात्त्विक, राजस या तामस?

English Meaning

Arjuna said: O Krishna, those who, setting aside the rules of scripture, worship with faith — what is their state? Is it sattvic, rajasic or tamasic?

2 श्लोक 17.2
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।2।।
हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले: मनुष्यों की स्वभाव से उत्पन्न वह श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी; उसे सुन।

English Meaning

The Blessed Lord said: The faith of embodied beings, born of their own nature, is of three kinds — sattvic, rajasic and tamasic; hear of it.

3 श्लोक 17.3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।3।।
हिंदी अर्थ

हे भारत! सबकी श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है; मनुष्य श्रद्धामय है — जो जैसी श्रद्धा वाला है, वह वैसा ही है।

English Meaning

The faith of each is according to his nature, O Bharata; man is made of his faith — as is his faith, so is he.

4 श्लोक 17.4
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।4।।
हिंदी अर्थ

सात्त्विक लोग देवताओं को पूजते हैं, राजस यक्ष-राक्षसों को, और तामस लोग प्रेत व भूतगणों को पूजते हैं।

English Meaning

The sattvic worship the gods; the rajasic, the yakshas and rakshasas; and the tamasic worship ghosts and spirits.

5-6 श्लोक 17.5 – 17.6
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।5।।
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।6।।
हिंदी अर्थ

जो लोग शास्त्र-विरुद्ध, मनगढ़ंत घोर तप करते हैं, जो दम्भ-अहंकार और काम-राग-बल के अभिमान से युक्त हैं, और जो शरीर के तत्त्व-समूह को तथा भीतर बसे मुझ परमात्मा को भी कृश (कष्ट) देते हैं — उन अविवेकी लोगों को आसुरी निश्चय वाला जान।

English Meaning

Those who practise terrible austerities not enjoined by scripture, given to hypocrisy and egoism, driven by the force of desire and attachment; senselessly torturing the elements in the body and Me too, dwelling within — know them to be of demonic resolve.

7 श्लोक 17.7
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।7।।
हिंदी अर्थ

भोजन भी सबको अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है; वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं — उनके भेद सुन।

English Meaning

The food that is dear to each is also of three kinds, according to his nature; and so too are sacrifice, austerity and charity. Hear of their distinctions.

8 श्लोक 17.8
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।8।।
हिंदी अर्थ

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाले; रसयुक्त, चिकने, पुष्टिकर और मन को भाने वाले आहार सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।

English Meaning

Foods that promote long life, intelligence, strength, health, happiness and cheer; that are juicy, smooth, nourishing and pleasing — these are dear to the sattvic.

9 श्लोक 17.9
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।9।।
हिंदी अर्थ

कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले, दुःख-शोक-रोग देने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।

English Meaning

Foods that are bitter, sour, salty, very hot, pungent, dry and burning, causing pain, grief and disease — these are dear to the rajasic.

10 श्लोक 17.10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।10।।
हिंदी अर्थ

अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, जूठा और अपवित्र भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।

English Meaning

Food that is stale, tasteless, putrid, left over and impure — this is dear to the tamasic.

11 श्लोक 17.11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।11।।
हिंदी अर्थ

जो यज्ञ शास्त्र-विधि से, 'यह करना ही कर्तव्य है' मन में ठानकर, फल की इच्छा बिना किया जाता है, वह सात्त्विक है।

English Meaning

That sacrifice which is offered according to scripture, by those who seek no fruit, with the firm conviction that it is a duty — that is sattvic.

12 श्लोक 17.12
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।12।।
हिंदी अर्थ

हे भरतश्रेष्ठ! किन्तु जो यज्ञ दिखावे के लिए या फल को सामने रखकर किया जाता है, उसे राजस जान।

English Meaning

But that sacrifice offered for show, or with an eye to its fruit, know to be rajasic, O best of the Bharatas.

13 श्लोक 17.13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।13।।
हिंदी अर्थ

शास्त्र-विधि से हीन, अन्नदान-रहित, बिना मंत्र, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किया गया यज्ञ तामस कहलाता है।

English Meaning

The sacrifice that is contrary to scripture, in which no food is distributed, devoid of mantras, gifts and faith — that is called tamasic.

14 श्लोक 17.14
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।14।।
हिंदी अर्थ

देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानियों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहलाता है।

English Meaning

Worship of the gods, the twice-born, teachers and the wise; purity, uprightness, celibacy and non-violence — this is called austerity of the body.

15 श्लोक 17.15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।15।।
हिंदी अर्थ

जो वाणी उद्वेग न करे, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय और नाम-जप का अभ्यास — यह वाणी का तप कहलाता है।

English Meaning

Speech that causes no distress, that is truthful, pleasant and beneficial, and the regular practice of study and recitation — this is called austerity of speech.

16 श्लोक 17.16
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।16।।
हिंदी अर्थ

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।

English Meaning

Serenity of mind, gentleness, silence, self-control and purity of intention — this is called austerity of the mind.

17 श्लोक 17.17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।17।।
हिंदी अर्थ

फल न चाहने वाले युक्त पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किया गया यह तीन प्रकार का तप सात्त्विक कहलाता है।

English Meaning

This threefold austerity, practised with supreme faith by steadfast people who seek no fruit, is called sattvic.

18 श्लोक 17.18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।18।।
हिंदी अर्थ

जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए या दिखावे के लिए किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला राजस तप कहलाता है।

English Meaning

Austerity done for the sake of respect, honour and reverence, or for show, is called rajasic — unstable and impermanent.

19 श्लोक 17.19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।19।।
हिंदी अर्थ

जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, अपने को पीड़ा देकर या दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वह तामस कहलाता है।

English Meaning

Austerity performed with foolish obstinacy, with self-torture, or to harm another, is declared to be tamasic.

20 श्लोक 17.20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।20।।
हिंदी अर्थ

'देना कर्तव्य है' — इस भाव से, उचित देश-काल-पात्र देखकर, प्रत्युपकार न चाहने वाले को दिया गया दान सात्त्विक कहलाता है।

English Meaning

Charity given as a duty, to a worthy person who can make no return, at the right place and time — that gift is held to be sattvic.

21 श्लोक 17.21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।21।।
हिंदी अर्थ

किन्तु जो दान प्रत्युपकार की आशा से, फल को सामने रखकर, या अनिच्छा-क्लेश से दिया जाता है, वह राजस कहलाता है।

English Meaning

But the gift given grudgingly, expecting a return or looking to its fruit, is held to be rajasic.

22 श्लोक 17.22
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।22।।
हिंदी अर्थ

जो दान बिना सत्कार, तिरस्कारपूर्वक, अनुचित देश-काल में और कुपात्र को दिया जाता है, वह तामस कहलाता है।

English Meaning

The gift given at the wrong place and time, to unworthy persons, without respect or with contempt, is declared to be tamasic.

23 श्लोक 17.23
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।23।।
हिंदी अर्थ

'ॐ तत् सत्' — ब्रह्म का यह तीन प्रकार का नाम कहा गया है; इसी से सृष्टि के आदि में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गये।

English Meaning

'Om Tat Sat' — this is said to be the threefold designation of Brahman; by it, in ancient times, were ordained the Brahmins, the Vedas and the sacrifices.

24 श्लोक 17.24
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।24।।
हिंदी अर्थ

इसलिए ब्रह्मवादी (वेदज्ञ) पुरुषों की शास्त्रोक्त यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ सदा 'ॐ' का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।

English Meaning

Therefore, with the utterance of 'Om', the acts of sacrifice, charity and austerity ordained by scripture are always begun by the knowers of Brahman.

25 श्लोक 17.25
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।25।।
हिंदी अर्थ

'तत्' (वह परमात्मा का है) — इस भाव से, फल की इच्छा छोड़कर, मोक्ष चाहने वाले लोग नाना यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ करते हैं।

English Meaning

With the word 'Tat', and without seeking any fruit, the various acts of sacrifice, austerity and charity are performed by those who desire liberation.

26 श्लोक 17.26
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।26।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! 'सत्' शब्द सत्य-भाव और श्रेष्ठ-भाव में प्रयोग होता है; और उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द लगाया जाता है।

English Meaning

The word 'Sat' is used in the sense of reality and of goodness, O Partha; and the word 'Sat' is also applied to an auspicious act.

27 श्लोक 17.27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।27।।
हिंदी अर्थ

यज्ञ, तप और दान में जो दृढ़ स्थिति है, वह भी 'सत्' कही जाती है; और उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी निश्चय ही 'सत्' कहलाता है।

English Meaning

Steadfastness in sacrifice, austerity and charity is also called 'Sat'; and action for the sake of the Supreme is likewise called 'Sat'.

28 श्लोक 17.28
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।28।।
हिंदी अर्थ

हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप और जो भी शुभ कर्म हो — वह 'असत्' कहलाता है; वह न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।

English Meaning

Whatever is offered, given or performed, and whatever austerity is practised, without faith, is called 'Asat', O Partha; it bears no fruit here or hereafter.

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